"क्या है-भारत का भविष्य !!! -हर बात का विरोध-विरोध-विरोध-बस इतना ही या कुछ और भी है ? क्या मिल रहा है इससे भारत को , कहाँ जा रहे है हम , क्या यही हमे विरासत मिली है , या हमने विरासत भूला कर सिर्फ़ विरोध को ही अपना लक्ष्य बना लिया है । क्या कर रहे है हम !!! अपने का भी विरोध, पराये का भी विरोध,क्या हमने भी हमारे हाथ पर एक नौटंकी-बाज की नकल करके लिखवा लिया है - ‘मेरा बाप चोर है’ । हमारे सभी राष्ट्रिय-सामाजिक-न्ययिक-राजनैतिक-पारिवारिक स्तभों का हम विरोध ही करते है , क्या हमारे राष्ट्रीय जीवन में कोई सकारात्मक पहलू नही बचा है ,या हमने ठान ली है सब कुछ मिटा देने की......!!!
ठहरों...रुक जाओ...सोचो...सकारात्मक करों...रुको मत...भटको मत...डरो मत...सृजन करों...सृजन करो...ध्वंस की सड़ाधं के नही...सृजन की तितिक्षा-तप के मूकशिल्पी बनो..अपने स्वप्न साकार करों ।"
"देखो-देखो !!! हमारे ही पूर्वजो के स्मारको पर सारा संसार अपनी श्रद्धा के पुष्प बिखेर रहा है , पर्यटन के जितने भी स्मारक है हमारे ही पूर्वजो के बनाये है , मानवीय करुणा के उच्चतम शिखर है यह सब, इनकी बात सुनो , हमें भी महानता का शिल्पी होना है । महानतम शिल्पी होना है।"
"क्या है हमारी विरासत और वसीयत हमारे उत्तराधिकारियों के नाम - क्या विरोध करने की कला ?"
Friday, May 15, 2009
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